40 साल से अधर में सर्वे, गलत नक्शों के सहारे किसानों को बेदखल करने की तैयारी!
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Published - 07 June 2026 81 views
हाईकोर्ट और राजस्व परिषद के आदेशों पर भी नहीं हुई कार्रवाई, शिकायत वाले अधिकारी को ही सौंपी गई जांच
बिना सूचना मकान तोड़े जाने के बाद बढ़ा विवाद, ग्रामीणों ने डीएम से लगाई न्याय की गुहार
सोमेन्द्र नाथ
सार्थक संवाददाता उन्नाव
उन्नाव जनपद के कटरी पीपरखेड़ा और मझरा पीपरखेड़ा गांव में भूमि सर्वे और राजस्व अभिलेखों का विवाद एक बार फिर चर्चा में है। ग्रामीणों ने जिलाधिकारी को शिकायती पत्र देकर आरोप लगाया है कि जिन नक्शों और अभिलेखों को स्वयं राजस्व विभाग वर्षों पहले त्रुटिपूर्ण और विवादित मान चुका है, आज उन्हीं के आधार पर किसानों और भू-स्वामियों को नोटिस जारी कर बेदखल करने की तैयारी की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि चार दशक से लंबित सर्वे प्रक्रिया पूरी न होने के कारण हजारों बीघा भूमि का वास्तविक सीमांकन आज तक नहीं हो सका है।
कई बार स्वीकार हुई अभिलेखों में त्रुटि, फिर भी नहीं हुआ समाधान
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2002, 2007, 2016, 2020, 2023 और 2024 में विभिन्न राजस्व अधिकारियों द्वारा जारी पत्रों और रिपोर्टों में गांव के नक्शों, सीमांकन और अभिलेखों में गंभीर त्रुटियां होने की बात स्वीकार की गई थी। कई स्थानों पर दिशा संबंधी गलतियां, क्षेत्रफल में अंतर तथा गाटों की स्थिति में विसंगतियां दर्ज की गई थीं।
ग्रामीणों का कहना है कि राजस्व परिषद लखनऊ और उच्च न्यायालय द्वारा भी सही सर्वे कराकर अभिलेखों को दुरुस्त करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन आज तक आदेशों का पूर्ण पालन नहीं किया गया। इससे भूमि विवाद लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
बिना सूचना मकान तोड़े जाने से भड़का आक्रोश
ग्रामीणों का आरोप है कि हाल ही में प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान कुछ मकानों को बिना पूर्व सूचना और पर्याप्त अवसर दिए ध्वस्त कर दिया गया। प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्हें न तो सही सीमांकन दिखाया गया और न ही यह स्पष्ट किया गया कि कार्रवाई किन अभिलेखों के आधार पर की जा रही है।
मकान ध्वस्तीकरण के बाद प्रभावित भू-स्वामियों ने आपत्ति दर्ज कराई और मामले को संपूर्ण समाधान दिवस में उठाते हुए जिलाधिकारी को शिकायत पत्र सौंपा। इसके बाद गांव में प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर असंतोष और बढ़ गया।
जिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत, उसी को सौंप दी जांच
ग्रामीणों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि शिकायत में जिन अधिकारियों की कार्यप्रणाली और निर्णयों पर सवाल उठाए गए थे, जांच की जिम्मेदारी भी उन्हीं अधिकारियों को सौंप दी गई। इससे जांच की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध शिकायत की गई है तो जांच किसी स्वतंत्र और वरिष्ठ अधिकारी द्वारा कराई जानी चाहिए। शिकायतकर्ता इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बता रहे हैं और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
प्रभावशाली लोगों पर नरमी, किसानों पर कार्रवाई का आरोप
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि प्रशासन की कार्रवाई का दायरा केवल गरीब किसानों और सामान्य भू-स्वामियों तक सीमित दिखाई देता है। उनका कहना है कि क्षेत्र में कई प्रभावशाली लोगों द्वारा किए गए कब्जों और निर्माणों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं की जा रही, जबकि छोटे किसानों को नोटिस जारी कर बेदखली की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
इस कथित भेदभावपूर्ण रवैये से ग्रामीणों में रोष बढ़ता जा रहा है और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
ग्रामीणों ने रखीं पांच प्रमुख मांगें
जिलाधिकारी को सौंपे गए शिकायती पत्र में ग्रामीणों ने मांग की है कि—
कटरी पीपरखेड़ा और मझरा पीपरखेड़ा के सभी गाटों का पुनः निष्पक्ष सर्वे कराया जाए।
आधुनिक तकनीक एवं सही राजस्व अभिलेखों के आधार पर सीमांकन सुनिश्चित किया जाए।
सर्वे प्रक्रिया पूरी होने तक किसी भी किसान अथवा भू-स्वामी को बेदखल न किया जाए।
गलत अभिलेखों के आधार पर हुई कार्रवाई की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
शिकायत वाले अधिकारियों से जांच हटाकर स्वतंत्र अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपी जाए तथा दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई की जाए।
न्याय नहीं मिला तो फिर होगी न्यायालय की शरण
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया और त्रुटिपूर्ण अभिलेखों के आधार पर कार्रवाई जारी रही तो वे पुनः उच्च न्यायालय की शरण लेने को बाध्य होंगे। उनका कहना है कि चार दशक से लंबित सर्वे और अभिलेख सुधार का मुद्दा अब केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि हजारों लोगों के अधिकारों और आजीविका से जुड़ा विषय बन चुका है।
बड़ा सवाल
जब राजस्व विभाग स्वयं कई बार अभिलेखों और नक्शों में त्रुटियां स्वीकार कर चुका है, उच्च न्यायालय और राजस्व परिषद के निर्देश भी मौजूद हैं, तब सही सर्वे कराए बिना किसानों और भू-स्वामियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों की जा रही है? और जिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत की गई, उसी को जांच सौंपना क्या निष्पक्ष जांच की कसौटी पर खरा उतरता है?
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